Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
यथा स्वप्नो महारम्भो भ्रान्तिरेव न वस्तुतः ।
दीर्घस्वप्नं तथैवेदं विद्धि चित्तोपपादितम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे बड़े-बड़े आरम्भों से पूर्ण स्वप्न भ्रम
ही है, वास्तविक नहीं है वैसे ही चित्त द्वारा उत्पादित इस जगत को भी आप दीर्घ स्वप्न समझिये