Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
य इमं गुणसंघातं भावयन्सुखमीहते ।
प्रमार्ष्टि स जडो जाड्यं वह्निभावनया स्वया ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष शब्दादिगुणों के समूहरूप इस देह आदिकी भावना करता हुआ अर्थात् देह आदि में
अहं, मम" ऐसा अभिमान करता हुआ सुखी होना चाहता है वह जड़ अपनी अग्नि की भावना से शीत
को हटाता है