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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

असदेवेदमाभोगि दृश्यते जलपञ्जरम् । मनोमनननिर्माणहृदये नगरं यथा ॥ ३२ ॥ इदं चित्तेच्छयोदेति लीयते तदनिच्छया । मिथ्यैवं दृश्यते स्फीतं गन्धर्वनगरं यथा ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

यह जड़ संघात देह आदिरूप विशाल जगत हृदय में मन के संकल्प से निर्मित विशाल नगर के समान असत्‌ ही है