Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
राम नष्टे जगत्यस्मिन्न किंचिदपि नश्यति ।
युक्तेऽपि च जगत्यस्मिन्न किंचिदपि युज्यते ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि यह ऐच्छिक संकल्प से उत्पन्न हुआ है, तो ऐच्छिक निवृत्ति के संकल्प से क्यो नहीं निवृत्त हो
जाता है, ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते हैं।
यह दृश्य प्रपंच मन की इच्छा से उपजता है और मन की अनिच्छा से राग का विनाश होने से ही
विलीन हो जाता है । इस तरह का यह विशाल गन्धर्वनगर के तुल्य झूठ-मूठ ही दिखाई देता है ॥ ३ ३॥
इसलिए इसके विनाश या वृद्धि में शोक और हर्ष करना उचित नहीं है, ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, इस जगत के नष्ट होने पर कुछ भी नष्ट नहीं होता और इस जगत की समृद्धि
होने पर कुछ भी समृद्ध नहीं होता