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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verses 35–36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verses 35–36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 35

संस्कृत श्लोक

मनःप्रकल्पिते भग्ने हृदि विस्तीर्णपत्तने । वृद्धिं चोपगते ब्रूहि किं वृद्धं कस्य किं क्षतम् ॥ ३५ ॥ क्रीडार्थेन यथोदेति बालानां हृदि वर्तनम् । मनसा तद्वदेवेदमुदेत्यविरतं जगत् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

हृदय मेँ मन से कल्पित विशाल नगर के खण्डहर हो जाने पर और वृद्धि को प्राप्त होने पर भला बतलाइये तो सही किसका क्या नष्ट हुआ और क्या बढ़ा ?