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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा । योऽभिवाञ्छत्यसद्राम तस्यासत्तैव दृश्यते ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

असत्‌ और सत्‌ पक्षों में समान उपपत्ति दिखलाते हैं। आदि और अन्त में जो नहीं है, वर्तमान में भी उसकी असत्ता ही है। हे श्रीरामचन्द्रजी, जो यह असत्‌ है, इस पक्ष की इच्छा करता है, उसको असत्ता ही दिखाई देती है। भाव यह है कि (असद्वा इृदमग्र आसीत्‌” (सृष्टि से पहले यह असत्‌ ही था) नैवेह किंचनाअ्ग् आसीत्‌“ (यहाँ पहले कुछ भी न था) इत्यादि श्रुतियों से आकाश, वायु, भुवन आदि के आगे पीछे असत्ता सुनी जाती है और घट आदि की असत्ता प्रत्यक्ष अनुभव से देखी जाती है। चिरकाल तक, आदि और अन्त में असत्ता, थोड़े काल के लिए एक बार सत्ता प्रत्येक व्यक्ति में प्रसिद्ध है एक दूसरे का विनाशक होने के कारण सत्त्व और असत्व-दोनो एकवस्तु में एक के त्याग के बिना नहीं रह सकते, इसलिए दोनों में से एक अवश्य त्याज्य है । आदि और अन्त में चिरकाल तक असत्त्व की प्रसिद्धि होने से वर्तमान दशा में भी सब व्यक्तियों की असत्ता ही है यों असत्ता के पक्ष की इच्छा करनेवाले को श्रुति, युक्ति ओर अनुभवों द्वारा असत्ता ही दिखाई देती है