Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
आदावन्ते च यत्सत्यं वर्तमाने सदेव तत् ।
यस्य सर्वं सदेव स्यात्तस्य सत्तैव दृश्यते ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
आदि ओर अन्त में जो सत्य है, वर्तमान में भी वह सत् ही है, जिसकी सब सत्
ही है, ऐसी मति हो, उसकी दृष्टि में सब सत् ही है। भाव यह है कि 'सदेवसोम्येदमग्र आसीत्, "कथमसतः
सज्जायेत' (हे सोम्य, सृष्टि के पूर्व यह सत् ही था, असत् से सत् कैसे हो सकता है) इत्यादि श्रुतियों
से और प्रमाण की प्रवृत्ति के समय सत्-सत् यों सब वस्तुओं का अनुभव होने से आदि और अन्त काल
में सत्ता की अनभिव्यक्ति अथवा तिरोभावमात्र कल्पना से "असद्वा इदमग्र आसीत' इत्यादि श्रुति और
युक्तियों की उपपत्ति होने से और सत्ता की श्रुति और युक्तियों की अन्यथा उपपत्ति न हो सकने से सब
पदार्थों की सर्वकालिक ओर सार्वत्रिकी एक ही सत्ता युक्त है, क्योंकि इसी में लाघव है, यों सत्ता की
एकता के सिद्ध होने पर आदि ओर अन्त में कारणभूत ब्रह्म की सत्ता से ही सब के सत्य होने से वर्तमान
काल में भी वह सत्य ही है, यों सद्वादी को अखण्ड ब्रह्मसत्ता ही सर्वत्र दिखाई देती हे