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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

अनादिमत्योऽविरतं प्रस्फुरन्ति तरङ्गवत् । पूर्वात्पूर्वं किलाभूवंस्ततः पूर्वतरं यथा ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

अनादि काल से सृष्टि परम्पराएँ तरंगों के समान निरन्तर स्फुरित होती हैं, पूर्व से पहले ये थी और वैसे ही उससे भी पहले विद्यमान थी