Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verses 20–22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verses 20–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 20-22
संस्कृत श्लोक
भूत्वा भूत्वा प्रलीयन्ते ससुरासुरमानवाः ।
सरित्तङ्गभङ्ग्यैव समस्ता भूतजातयः ॥ २० ॥
यथेदमण्डं वैरिञ्चं तथा ब्रह्माण्डपङ्क्तयः ।
याः सहस्राः परिक्षीणा नाडिका वत्सरेष्विव ॥ २१ ॥
अन्याः संप्रति विद्यन्ते वर्तमानशरीरकाः ।
प्रान्ते ब्रह्मपुरस्यास्य वितते ब्रह्मणः पदे ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
देवता, असुर और मनुष्यों से युक्त ये सब भूत जातियाँ नदी की तरंगों की रीति से ही उत्पन्न हो-
होकर लीन हो जाती हैं, जैसे यह ब्रह्माण्ड है वैसे ही जो हजारों ब्रह्माण्ड परम्पराएँ है, वे जैसे वर्षो में
हजारों घड़ियाँ क्षीण हो जाती हैं वैसे ही क्षीण हो गई है और अन्य ब्रह्माण्ड पंक्तियाँ इस समय भी
ब्रह्मोपलब्धि का स्थान होने से ब्रह्मपुरूष शरीर के एक स्थान में (हृदयकमल का रूप एकदेश में) स्थित
अत्यन्त विस्तीर्ण ब्रह्म में वर्तमान शरीरवाली विद्यमान हैँ, अतएव “अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव
समाहिते" (इस शरीर में आकाश ओर पृथिवी भीतर ही समाहित हैं) इत्यादि श्रुति हे