Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
चित्स्पन्द एव सर्वात्मा सर्वदैवेदृशाकृतिः ।
यदस्माज्जायते सर्गो द्वीन्दुत्वमिव लोचनात् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वात्मा चिद्विवर्त ही सदा इस प्रकार की आकृतिवाला होता है,
क्योंकि जैसे लोचनो से द्विचन्द्रत्व उत्पन्न होता है वैसे ही इससे यह सृष्टि उत्पन्न होती है