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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 64

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verse 64 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 64

संस्कृत श्लोक

अज्ञदृष्ट्या त्वविच्छिन्नसंसारत्वादनारतम् । नित्या संसारमायेयं मिथ्यापीहोपपद्यते ॥ ६४ ॥

हिन्दी अर्थ

अज्ञानी की दृष्टि से निरन्तर अविच्छिन्न संसार के रहने के कारण मिथ्या भी यह संसारमाया नित्य है, यह उपपन्न ही है