Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 67
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verse 67 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 67
संस्कृत श्लोक
सर्वत्रोदितचन्द्रार्का दिशो दृष्टाः स्थिराचलाः ।
अविनाशि जगत्सर्वमित्यप्यवितथोपमम् ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी प्रकार चन्द्रमा और सूर्य के तेज प्रकाश से युक्त दिशाओं में पर्वत, भूमि, समुद्र आदि की
स्थिरता देखने से जगत अपनी सत्ता से सदा सत् ही है, इस प्रकार की साख्यआदि की कल्पना भी
उपपन्न होती है, ऐसा कहते है।
सभी जगह जिनमें चन्द्रमा ओर सूर्य उदित हुए हैं, ऐसी दिशाएँ सर्वत्र स्थिर और निश्चल दिखाई
देती है, इसलिए सारा जगत अविनाशी है, यह कथन भी सत्य-सा हे