Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verses 69–70
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verses 69–70 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 69,70
संस्कृत श्लोक
पुनःपुनरिदं सर्वं पुनर्मरणजन्मनी ।
पुनः सुखं पुनर्दुःखं पुनः करणकर्मणी ॥ ६९ ॥
पुनराशाः पुनर्व्योम पुनरम्भोधयोऽद्रयः ।
अभ्युदेति पुनः सृष्टिः खवदर्कप्रभा यथा ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
प्रसंगतः प्राप्त सब पदार्थों की उत्पत्ति की उपपत्ति कर प्रस्तुत सृष्टि के बार-बार होने का वर्णन
करते हैं।
यह सब दृश्य पुनः पुनः होता है, जन्म ओर मरण फिर फिर होते हैं, फिर सुख होता है, फिर दुःख
होता है, फिर कारण और कर्म होते हैं, फिर दिशाएँ होती है, फिर आकाश होता है, फिर सागर और पर्वत
होते हैं। जैसे खिड़कीवाले घरों में एक ही सूर्य की प्रभा फिर फिर अनेकों तरह से प्राप्त होती है वैसे ही
बार बार यह सृष्टि नानारूप से होती है