Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 90
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verse 90 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 90
संस्कृत श्लोक
अविरलमिदमाततं विकल्पैरसदुदितैरपि तैर्द्विचन्द्रकल्पैः ।
विरचितमसतानुपन्नसत्यं जगदिह तेन विमूढता किमुत्था ॥ ९० ॥
हिन्दी अर्थ
दीर्घभ्रमरूप इस महामाया के आडम्बरमें यह सत्य है, यह असत्य हे", इस प्रकार निश्चय करने
के योग्य क्या कोई वस्तु है जो यहाँ पर कही जाय ? दाशूर की आख्यायिका के समान यह संसार चक्रकल्पना
से रचित आकारवाले तथा वस्तुशून्य है, वास्तविक नहीं है। ८ ८ ,८९॥ जबकि यह जगत अज्ञान से उत्पन्न
हुए अतएव दो चन्द्रमाओं के भ्रम के तुल्य विकल्पों से निरन्तर व्याप्त है, अविद्यमान कर्ता से ही इसकी
रचना हुई है एवं अधिष्ठानरूप ब्रह्म का इसने अनुसरण कर रक्खा है, तो यहाँ पर आपकी विमूढता किस
कारण से उत्पन्न हुई है । भाव यह कि जिस निमित्त को आप देखते हैं, वह है ही नहीं और जो परमार्थतः
है, वह अभय ब्रह्म ही है, इसलिए आपको बिना किसी निमित्त के यह मोह होना उचित नहीं हे