Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 48, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
ऋषिपुत्र महाप्राज्ञ किमज्ञ इव रोदिषि ।
संसारस्य न कस्मात्त्वं स्वरूपं वेत्सि चञ्चलम् ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
“हे ऋषिपुत्र, हे महाप्राज्ञ, तुम अज्ञानी के समान क्यों रोते हो, तुम संसार के चंचल
स्वरूप को क्या नहीं जानते ?