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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, Verse 25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 48, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

सर्वदैवेदृशी साधो संसारे संसृतिश्चला । जायते जीव्यते पश्चादवश्यं च विनश्यति ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

हे सज्जन, संसार में चंचल सृष्टि सदा ऐसी ही है, वह पहले तो उत्पन्न होती है, जीवित रहती है और पीछे अवश्य विनष्ट हो जाती है