Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 48, Verses 26–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 48, verses 26–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 48 · श्लोक 26,27
संस्कृत श्लोक
यद्यत्किंचिद्दृश्यदृशि ब्रह्मादिकमिदं मुने ।
गन्तव्यस्तेन सर्वेण विनाशो नात्र संशयः ॥ २६ ॥
तदर्थं मा कृथा व्यर्थं विषादं मरणे पितुः ।
अवश्यभाव्यस्तमयो जातस्याहर्षतेरिव ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, व्यवहार
दृष्टि में ब्रह्मा आदि यह जो कुछ भी वस्तु प्रसिद्ध है, उसका अवश्य विनाश हो जायेगा, इसमें कोई
सन्देह नहीं है इसलिए पिता के मरण के लिए तुम व्यर्थ विषाद मत करो । जैसे उदित हुए सूर्य
अवश्य डूबते हैं वैसे ही उत्पन्न हुए का विनाश अवश्यम्भावी है