Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 50, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 50, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 50 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
गगनगतलतादलोपविष्टः प्रसृतवनावनिवारिवाहवेषाः ।
त्रिभुवनवनिता ददर्श हृष्टः कुसुमनिरन्तरमण्डिता दशाशाः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाश में फैली हुई शाखा के
पत्तों पर बैठे हुए सन्तुष्ट दाशूर ने दस दिशाओं को देखा । विस्तृत वन, पृथिवी ओर मेघ ही जिनके
कृत्रिमाकार के भेदक अलंकार थे, जो तीनों भुवनो मे रहनेवाले लोगों की उपभोग्य होने के कारण
त्रिभुवनवनिता रूप ओर फूलों से खूब सुशोभित थी