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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 51, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 51, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 2, 3

संस्कृत श्लोक

तस्मिँल्लतादले स्थित्वा विलोक्य ककुभः क्षणात् । दृढपद्मासनं बद्ध्वा दिग्भ्यः प्रत्याहृतात्मना ॥ २ ॥ अज्ञातपरमार्थेन क्रियामात्रे च तिष्ठता । फलकार्पण्ययुक्तेन मनसा सोऽकरोन्मखम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

उस शाखा के पत्ते पर बैठकर, क्षणभर दिशाओं को देखकर, दृढ़ पद्मासन बाँधकर दिशाओं से परावर्तित, परमार्थ ज्ञानरहित केवल कर्मकाण्ड में अभिरुचिवाले, फलाभिलाषा से युक्त मन से उन्होंने यज्ञ किया