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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 51, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 51, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 51 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

नभोगतलतापत्रसंस्थितेनान्तरात्मना । सर्वाः स्वमनसा तेन कृता यज्ञक्रियाः क्रमात् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

आकाश में फैली हुई शाखा के पत्ते पर बैठे हुए समाधिस्थ उन्होंने क्रमश: सब यज्ञ क्रियाएँ अपने मन से कर डाली