Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 52, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 52, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
व्योमन्येवातिवितते जातोऽसौ त्रिशरीरकः ।
तत्रैव च स्थितिं यातः शब्दपातश्च पक्षिवत् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
तीन शरीरवाला
यह पक्षी के तुल्य अत्यन्त विशाल अव्याकृत आकाश में ही उत्पन्न हुआ है, वहीं पर रहता है, विधि-
निषेधरूप शब्द के अनुसार चलता है। भाव यह है कि जैसे पक्षी आकाश में ही अण्डमय, पिण्डमय और
पक्षमय तीन शरीरवाला क्रम से उत्पन्न होता है, सब ओर से उसे जान जोखिम की शंका रहती है,
असार पीपल आदि के फलास्वाद में लोलुप रहता है, शब्दमात्र से उड़ता है, वास्तविक बात का विचार
नहीं करता वैसे ही यह भी स्थूल, सूक्ष्म और कारणरूप तीन शरीरवाला है ब्रह्माकाश में उत्पन्न होकर
चारों ओर से भय की शंका करता है, तुच्छ विषयो मे आसक्त हो विधि-निषेधरूप शब्द के अनुसार
चलता हुआ घूमता है