Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 52, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 52, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 52 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
पुनरुत्पद्यते तूर्णं स्वात्मनोर्मिरिवाम्भसः ।
व्यवहारं तनोत्युच्चैः पुनरारम्भमन्थरम् ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
फिर वह जल से तरंग के समान पूर्ण स्वभाव से ही तुरन्त फिर उत्पन्न हो जाता है।
(क्योंकि वही मैं हूँ, ऐसा सोकर उठे हुए पुरुष को प्रत्यभिज्ञा होती है) और फिर विविध आरम्भों से
परिपूर्ण व्यवहार करता है