Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 53, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
संकल्पितानन्दलवस्तिष्ठत्युद्धरकन्धरम् ।
अकस्मात्प्रच्युतमधुबिन्दुभुक्करभो यथा ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे गदहा अकस्मात गिरे हुए शहद की बूँदों का
स्वाद लेता है, वैसे ही आनन्द लेश का संकल्प करनेवाला वह मारे हर्ष के ऊँची गर्दन करके स्थित
रहता है। गदहा इस दृष्टान्त से यह सूचित किया कि जैसे गदहे के लिए शहद चाटना अत्यन्त दुर्लभ
है वैसे ही उसके लिए विषयसुख भी अत्यन्त दुर्लभ है, मोक्ष सुख की तो कौन कहे !