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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 53, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 44

संस्कृत श्लोक

संकल्पतन्तावखिला भावाः प्रोताः किलानघ । छिन्ने तन्तौ न जाने ते क्व यान्ति विशरारवः ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई शंका करे कि एकमात्र संकल्प के नष्ट होने पर संपूर्ण जगद्रूप बन्धन की निवृत्ति कैसे होती है, तो इस पर कहते है । हे निष्पाप, सम्पूर्ण पदार्थ संकल्परूपी सूत्रम गुँथे हुए हे । संकल्परूपी सूत्र के टूटने पर छिन्न- भिन्न हुए पदार्थ न मालूम कहाँ चले जाते हैँ । भाव यह है कि आरोपित पदार्थो की अधिष्ठान में प्रतीति होती है, उनके अन्यत्र गमन की प्रसिद्धि नहीं है