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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verses 9–11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 53, verses 9–11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 9-11

संस्कृत श्लोक

शून्ये व्योमनि तेनेदं निर्मितं त्रिजगत्पुरम् । प्रतिभासानुसंधानमात्रेणैत्य विरिञ्चिताम् ॥ ९ ॥ यत्रेमे विततालोका लोककोशाश्चतुर्दश । वनोपवनमालाश्च यत्रोद्यानपरम्पराः ॥ १० ॥ क्रीडाशिखरिणो यत्र सह्यमन्दरमेरवः । शीतोष्णदीप्ती चन्द्रार्कौ दीपौ यत्रानलाकृती ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

तीनों कालों में जगत के अभाव से युक्त ब्रह्म में उसने इस त्रिजगतरूपी घर को बना रक्खा है अचेतन संकल्प में जगन्निर्माण शक्ति कहाँ से आई, ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योकि अधिष्ठानभूत चैतन्य के अनुग्रह से उसने चेतन बिरंचि के स्वरूप को प्राप्त कर त्रिजगद्रूपी नगर को बनाया है, जिस त्रिजगद्रूप नगर में सूर्य आदि के प्रकाश से युक्त चौदह लोक है, जहाँ पर वन, उपवनों की मालाओं से युक्त उद्यान परम्पराएँ है, जहाँ पर सह्य, मन्दर, मेरु क्रीड़ा शेल है, जहाँ पर अग्नि के समान प्रकाशमान शीतल ओर उष्ण कान्तिवाले चन्द्रमा-सूर्यरूपी दीपक हैं