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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 54, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 42

संस्कृत श्लोक

मम गुरुविभवोज्ज्वला विलासा इति तव मास्तु वृथैव विभ्रमोऽन्तः । त्वमपि च वितताश्च ते विलासा विलसति सर्वमिदं तदात्मतत्त्वम् ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

संसारी स्वभाववाले मेरे ये महासमृद्धियों से दैदीप्यमान भोगविलास सत्य है, ऐसा व्यर्थ भ्रम तुम्हारे अन्दर न हो । तुम और वे फैले हुए विलास तथा और भी जन्ममरणादिरूप जो दृश्य है इन सबके रूप से आत्मतत्त्व ही विलसित हो रहा है, दृश्यरूप कोई अतिरिक्त सत्‌ नहीं है