Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, Verses 1–2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 55, verses 1–2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 1, 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इत्याकर्ण्य तदा तत्र रात्रावालपनं द्वयोः ।
अहं रघुकुलाकाशशशाङ्क रघुनन्दन ॥ १ ॥
पतितः खात्कदम्बाग्रे पत्रपुष्पफलाकुले ।
तूष्णीं निर्वृष्टमुक्तात्मा शृङ्गाग्र इव तोयदः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रचपनवाँ सर्ग
पूजित श्रीवसिष्ठ का दाशूर के साथ वार्तालाप, कदम्ब शोभा का दर्शन और प्रातःकाल गमन |
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रघुकुलरूपी आकाश के चन्द्र श्रीरामचन्द्रजी, रात्रि मे उन दोनों के वार्तालाप
को इस प्रकार सुनकर मैं वहाँ पर वृष्टिजल के वेष से मेघ जैसे पर्वत की चोटी पर उतरा