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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 54, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

संकल्पेन हि संकल्पः स्वयमेव प्रजायते । वर्धते स्वयमेवाशु दुःखाय न सुखाय तु ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

उस मूलअकुर से शाखाअंकुरों की तरह बाह्यविषयाकार संकल्प परम्पराओं से संकल्पों की दुःखदायिनी वृद्धि कहते है। संकल्प से संकल्प स्वयं ही पैदा होता है और स्वयं ही दुःख के लिए वृद्धि को प्राप्त होता हे, उसकी वृद्धि सुख के लिए नहीं होती