Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 54, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 54, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 54 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
निगीर्णमातुलिङ्गस्य कनकप्रत्ययो यथा ।
स्वयमभ्येत्य सत्योऽन्तः संकल्पस्ते तथा हृदि ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
पूवनुभूत विषयवासनाओं के उद्दुद्ध होने से यह हेय जगद्भान्ति हुई है, ऐसा कहते है ।
जिस पुरुष ने मातुलिंग का फल (फलविशेष, जो नेत्र के पित्त को बढाता हुआ शुक्ल वस्तु में
पीतभ्रम उत्पन्न करता है) निगल लिया, उसे जैसे सर्वत्र कनक प्रतीति होती है वैसे ही असत्य यह
संकल्प तुम्हारे हृदय में स्वयं ही प्राप्त होता हे