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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, Verses 34–35

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 55, verses 34–35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

प्रातः प्रतनुतां याते पुष्पर्द्धिघनजालके । स्वर्गाङ्गनाङ्गभोगाभे तारकानिकरे शनैः ॥ ३४ ॥ आकदम्बनभोभागमुपयातं सुतान्वितम् । अहं विसृज्य दाशूरं ततोऽमरनदीं गतः ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रातःकाल अप्सराओं के अंगभाग की तरह सुशोभित, पुष्पशोभा के निविड समूह के सदुश तारामण्डल के धीरे-धीरे विलय होने पर कदम्बवृक्ष के आकाशभाग तक पुत्र के साथ मुझे बिदा करने के लिए आये हुए दाशूर मुनि को उनके निवास स्थान के लिए लौटाकर मे आकाशगंगा गया