Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 56, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
यतः कुतश्चिदेवेदं संपन्नमिव लक्ष्यते ।
अरुणातीरवद्वारिपूरावर्तवदाततम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि सूर्य सब प्राणियों के दिन कृत्य के निर्वाह में निमित्त मात्र है, दिन कृत्य के
कर्ता लोग तो उससे भिन्न दिखाई देते हैं, लेकिन जगत के निर्माण में दूसरे कर्ता नहीं हैं; यों दृष्टान्त
ओर दार्ष्टान्तिक में विषमता है, ऐसी आशंका करके कहते हैं ।
जैसे अरुणा नदी का तीर, जो स्वभावतः शिलाओं से विषम (ऊँचा-नीचा) है और जिसका
जलप्रवाह भी निम्न गतिशील है, प्रवाह में विषमता पैदा नहीं करता, किन्तु उन दोनो की सन्निधि में
उत्पन्न हुआ आवर्तं आकस्मिक ही है, वैसे ही चित् ओर जड़ की सन्निधि में यह जगत भी अकस्मात ही
उत्पन्न हुआ-सा दिखाई देता है । जगन्निर्माण के विषय में कर्तृता का भार किसी के सिर मढा नहीं जा
सकता, यह भाव है