Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verses 20–21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 56, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
इति चेद्भवता राम नैपुण्येनावधारितम् ।
प्रमाणपरिशुद्धेन चेतसा च विचारितम् ॥ २० ॥
तथापि भावनां साधो पदार्थं प्रति नार्हसि ।
अलातचक्रे स्वप्ने च भ्रमे वा केव भावना ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार विचार करने पर तो जगत में आस्था सुतरां उचित नहीं है, ऐसा कहते हैं ।
हे रामचन्द्रजी, ऐसा यदि आपने कुशलतापूर्वक निश्चय कर लिया और प्रमाण से शुद्ध चित्त से
विचार कर लिया, तो हे साधो, आप पदार्थो के प्रति भावना करने के योग्य नहीं हैं। भला बतलाइये तो
सही अलातचक्र (जलती हुई लकड़ी को गोल घुमाने से दिखनेवाला तेजोमय चक्र) में, स्वप्न में और
भ्रान्ति में भावना कैसे सम्भव है ?