Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 56, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

निरिच्छे संस्थिते रत्ने यथालोकः प्रवर्तते । सत्तामात्रेण देवे तु तथैवायं जगद्गणः ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे रत्न को इच्छा नहीं रहती है कि मुझसे प्रकाश हो, किन्तु उसके रहने पर जैसे प्रकाश होता है वैसे ही इच्छाशून्य परमात्मा के एकमात्र सत्तारूप से स्थित होने पर यह जगतो का समूह होता हे