Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
आत्मनो ज्ञस्य सर्गादेर्यन्मनागपि नोद्गतम् ।
तस्मिञ्जगत्त्रये प्राप्ते किं चिदात्मा बली भवेत् ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी आत्मा की दृष्टि से तो
तीनों जगत सृष्टि आदि से तनिक भी उत्पन्न नहीं हुए, क्योकि "निरोधोनचोत्पत्तिः" इत्यादि श्रुति हे ।
उन वन्ध्यापुत्र के समान तुच्छ तीनों जगतो के प्राप्त होने पर आत्मा क्या बलवान होगा, जिससे कि
उनमें उसका अनुराग होगा ?