Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verses 46–47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verses 46–47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 46,47
संस्कृत श्लोक
स्फारब्रह्मामलाम्भोधिफेनाः सर्वे कुलाचलाः ।
चिदादित्यमहाभासमृगतृष्णाजलश्रियः ॥ ४६ ॥
आत्मतत्त्वमहाम्भोधिवीचयः सर्गराजयः ।
अनुत्तमपदाम्भोदवृष्टयः शास्त्रदृष्टयः ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत को तत्त्वज्ञानी के आत्मप्रकाश की अपेक्षा है, इस बात को विस्तार से स्पष्ट करते हैं।
सभी कुल पर्वत विशाल ब्रह्मरूपी निर्मल सागर के फेन है; नदी, समुद्र आदि जलशोभाएँ चित्सूर्य
की महाप्रभा में मृगतृष्णा हैं; सारी की सारी सृष्टियाँ आत्म तत्त्वरूपी महासागर की तरंगे हैं और
शास्त्रदृष्टियाँ यानी श्रोत-स्मार्त धर्म और ब्रह्म तत्त्वप्रतिभास (ब्रह्मज्ञान) ब्रह्मरूपी मेघ की वृष्टि हे ।
यद्यपि लौकिक चाक्षुष आदि दृष्टि का प्रकाश रूप होने के कारण ब्रह्मरूपी मेघ की वृष्टि के सदृश ही हैं,
तथापि सुन्दर उपजाऊ खेत में वृष्टि के समान शास्त्रदृष्टियों का ही पुरुषार्थ मे उपयोग है, अतएव
उन्हीं का उपादान किया है