Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
चन्द्राग्नितपनालोका घटकाष्ठादिसन्निभाः ।
प्रकाशनीयाश्चिद्रूपत्विषो मलकणास्तथा ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
अधिष्ठानरूप से आत्मप्रकाश की अपेक्षा कह कर जड़ पदार्थो के प्रकाश के लिए भी उसकी
अपेक्षा है, ऐसा कहते हैं।
जब घड़े, काठ आदि के तुल्य चन्द्रमा, अग्नि और सूर्य चिद्रूप कान्ति के प्रकाशनीय है, तो मल कण
के तुल्य पृथिवी के धातु उसकी अपेक्षा करते हैं, इसमें कहना ही क्या है ? भाव यह है कि जब निर्मल
आदित्य आदि भी उसके प्रकाश की अपेक्षा करते हैं तब अत्यन्त मलिन होने के कारण मल कण के सदृश
पार्थिव आदि धातु अपने प्रकाश के लिए उसकी अपेक्षा करते हैं, इसमें कहना ही क्या है ?