Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अस्थिखण्डार्गलामूर्धपिधानाः स्नायुश्रृंखलाः ।
जगद्देहा जरज्जीवरक्तमांससमुवद्गकाः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
मृगो को वनविहार में स्वातन्त्रय है, किन्तु देहरूपी पिंजडे में वेधे रहने के कारण नर्, चुर और
असुरों को अत्यन्त परतन्त्रता का दुःख ही है, इस आशय से कहते हैं।
ब्रह्मा द्वारा जगत के नर, सुर ओर असुर आदि के शरीर अनादि संसाररूपी महावन में जर्जर हुए
जीवों के पर्याय क्रम से बन्धन के लिए रक्त और मांस के पिंजडे बनाए गये हैं । हड्डी के टुकड़े ही उनके
अर्गल (द्वार अवरोधक काष्ठ) हैं और सिर ही उनके ऊपर के ढकने हैं और नसे ही लोह की सिकड़ियाँ
है