Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
यस्यालोकाल्लोकपालाः समालोकाः सुवेदिनः ।
शरीरं पान्त्ययमिव पश्यन्मूढाः क्षपार्णवे ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस तत्त्ववेत्ता के चित्प्रकाश से ब्रह्मा आदि लोकपाल प्रकाशवाले होकर एवं चक्षु द्वारा
बाहर और बुद्धि द्वारा भीतर सम्यग् व्यवहार के उचित बोधवाले होकर अज्ञान समुद्र मे मग्न हो अपने
आत्मा को अशरीर समझते हुए भी मूढ़ होकर अज्ञ जन की तरह देहात्मभाव से शरीरों की रक्षा करते
हैं