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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 55

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 55

संस्कृत श्लोक

न केचन जगद्भावास्तत्त्वज्ञं रञ्जयन्त्यमी । अप्यभ्यासगताः स्फारहृदयं खमिवाम्बुदाः ॥ ५५ ॥

हिन्दी अर्थ

तत्त्वज्ञ पुरुष को, वैराग्य के दृढ़ होने के कारण भोगवासना का क्षय होने से जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, लोकपालों के भोग के योग्य भी त्रैलोक्य राज्यादि जगत के भाव पुनः पुनः अभ्यस्त होने पर भी ऐसे रंजित नहीं करते जैसे कि आकाश को मेघ रंजित नहीं करते