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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 56

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 56

संस्कृत श्लोक

न केचन जगद्भावास्तत्त्वज्ञं रञ्जयन्त्यमी । मर्कटा इव नृत्यन्तो गौरीलास्यार्थिनं हरम् ॥ ५६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे भगवती पार्वतीजी के नृत्य की इच्छा करनेवाले भगवान शंकर को नाचते हुए बन्दर अनुरंजित नहीं करते वैसे ही कोई भी जगत के पदार्थ तत्त्वज्ञ पुरुष को अनुरंजित नहीं करते