Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
न केचन जगद्भावास्तत्त्वज्ञं रजयन्त्यमी ।
प्राक्तनप्रतिबिम्बश्री रत्नं कुम्भगतं यथा ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे घडे से बाहर रहने की अवस्था में
रत्न के भीतर दिखाई दे रही स्तम्भ, दीवार आदि के प्रतिबिम्ब की शोभा घड़े में स्थित रत्न को अनुरजित
नहीं करती वैसे ही ये कोई भी पदार्थ तत्त्वज्ञ पुरुष को अनुरंजित नहीं करते