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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 58

संस्कृत श्लोक

वज्रार्पितोपममसन्मयमम्बुभङ्गतुङ्गं तरङ्गकृतबिम्बमिवावलोक्य । लोलां तदीहितसुखेषु रतिं न याति तज्ज्ञः कुशैवललवेष्विव राजहंसः ॥ ५८ ॥

हिन्दी अर्थ

पूवोक्त अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार करते है । जैसे राजहंस बगुले के खाने योग्य गन्दे शेवाल के टुकड़ों मेँ रति को प्राप्त नहीं होते वैसे ही तत्त्वज्ञानी भी ब्रह्मलोकपर्यन्त समस्त जगत के वैभव का अज्ञानी की दृष्टि से अति दुर्भेद्य होने के कारण वज्र के तुल्य, विवेकी की दृष्टि से जल विलासों में उन्नत तरंग द्वारा अपने अग्रभाग में किये गये चन्द्र आदि के प्रतिबिम्ब के तुल्य अनिर्वचनीय ओर अस्थिर एवं तत्त्वज्ञानी की दृष्टि से अति तुच्छ जानकर अज्ञ के समान उनके अभीष्ट सुखो मेँ अतिलालसा पूर्ण अनुराग को प्राप्त नहीं होते