Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 58, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 58, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
कस्मिंश्चिन्मेरुगहनेऽतिष्ठन्सुरगुरोः सुतः ।
कदाचिदभ्यासवशाद्विश्रान्तिं प्राप चात्मनि ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
मेरु के किसी वन में सुरगुरु के पुत्र कच
रहते थे । कभी शुद्ध ब्रह्मविद्या के मनन निदिध्यासन के परिपाक से वे आत्मा में विश्रान्ति को प्राप्त
हुए