Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 59, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अन्नपानाङ्गनासङ्गादृते नास्तीह किंचन ।
शुभमस्त्विति संवादि महान्किमिव वाञ्छतु ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रसंग प्राप्त कच गाथा को समाप्त करके भोग तत्वज्ञ की इच्छा आदि के योग्य नहीं है, इस विषय
का, जो प्रकृत है, उपपादन करते हुए श्रीवसिष्ठजी वैराग्य के उपदेश के लिए विषयो की निःसारता का
विस्तार से वर्णन करते है।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, इस संसार में अन्न-पान तथा स्त्रीरूप विषयों से जिह्वा,
उपस्थ आदि इन्द्रियो का जो संसर्ग है, उसके सिवा उत्तम पुरुषार्थ रूप और कुछ भी नहीं है, यह बात
श्रुति, स्मृति और पुरुषों के उपदेश से सिद्ध है, यह विचार कर परम पद में आरूढ पुरुष इन भोगों की
भला क्यो कर वांछा करेगा ? भाव यह कि यहाँ पर वांछा के योग्य कुछ भी नहीं है
सर्ग सन्दर्भ
अद्रावनर्वौँ सर्ग समाप्त उनसठवाँ सर्ग विषयों की निःसारता, ब्रह्मा के संकल्प से जगत की रचना, ब्रह्मा की निर्वेद से विश्रान्ति और शास्त्र सृष्टि का वर्णन |