Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verses 16–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 59, verses 16–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 16-18
संस्कृत श्लोक
ततः संकल्पयामास पूर्वं तेजो महाप्रभम् ।
शरदन्ते लताचक्रचक्रीकृतदिगन्तरम् ॥ १६ ॥
पक्षप्रतिमनिस्यूतकर्मणातिगुणाक्षरम् ।
पुञ्जपिञ्जरपर्यन्तं हेमज्ञाननिभाम्बरम् ॥ १७ ॥
जालहेमलताजालजटालनिजमन्दिरम् ।
कचत्प्रसरदुद्यानाकारकुण्डलमण्डितम् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
सूर्य आदि प्रकाश के अधीन सव व्यवहार हैं, अतः पहले आदित्य की सृष्टि को कहने की इच्छा से
श्रीवलिष्ठजी सूर्य के उपादानभूत सारे आकाश में व्याप्त तेज की सृष्टि कहकर उसी तेज का वर्णन
करते हैं।
तदनन्तर उन्होने पहले अत्यन्त प्रकाश से युक्त तेज का संकल्प किया, जिसने शरत्काल के अन्त
में बर्फ से सफेद हुई लताओं के समूह की तरह दिशाओं के मध्य भाग को परिवेष्टित किया था, जिसने
पक्षियों के पंखों के सदृश दोनों पार्श्वो में तन्तुओं के फैलाने से कभी क्षीण न होनेवाले शून्य रूप
आकाश को बहुत से तन्तुओं से युक्त-सा बनाया था, जिसने फैली हुई तेज की राशियों से आदि अन्त
तक पहुँचे हुए लोकालोक पर्वत के शिखर के रंग-बिरंग धातुओं के संसर्ग से दिगन्तों को पीला कर दिया
था, जिसने आकाश को स्वर्ण के समान चमकदार ओर अनावृत, अपरिच्छिन्न तथा प्रकाशमय होने के
कारण ब्रह्मज्ञान के तुल्य बना दिया था, जिसने ब्रह्मा के कमल को विकसित करने के लिए पंखुड़ियों के
अन्दर प्रविष्ट हुई किरणों से झरोखों पर बनाई गई सुवर्ण की झालरों की तरह चमकदार केसरों से
जटायुक्त कर दिया था और जो एकमात्र समुद्र की तरंगों में प्रतिबिम्बत होने के कारण देदीप्यमान तथा
चलते हुए उपवनों के तुल्य किरणों से विभूषित था