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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verses 26–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 59, verses 26–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 26-28

संस्कृत श्लोक

ब्राह्मं रूपमुपादाय मनोनाम महद्वपुः । तनोतीत्थमिमां दृष्टिं भूतसंततिसंकुलाम् ॥ २६ ॥ समुद्राचलवृक्षाढ्यां कृतलोकोत्तरक्रमाम् । मेरुभूपीठदिक्कुञ्जजटालोदरमण्डलाम् ॥ २७ ॥ सुखदुःखजराजन्ममरणस्वाधिबोधिताम् । रागद्वेषमयोद्विग्नां गुणत्रयमयात्मिकाम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार मन विशाल शरीरवाले ब्रह्मा का रूप धारण करके इस दृश्य सृष्टि का विस्तार करता है, जो प्राणियों की परम्परा से ठसाठस भरी है, समुद्र, पर्वत और वृक्षों से पूर्ण है, लोकोत्तर क्रम से युक्त हे, मेरु, भूमण्डल, दिशा के मंडल से जिसका मध्य भाग जटिल है एवं जो सुख-दुःख, जरा, जन्म, मरण आदि शारीरिक क्लेशो से और मानसिक क्लेशो से भी यह संसार सर्वथा हेय है यह इस तरह बोधित हुई है, राग ओर द्रेषमय होने के कारण उद्वेगयुक्त हे ओर सत्त्व, रज ओर तम इन तीनों गुणों से रची गई है