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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 59, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

अवलोक्य जगच्चेष्टां मर्यादां विनियोज्य च । ब्रह्मा कमलपीठस्थः पुनः स्वात्मनि तिष्ठति ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

कमलासन में स्थित हुए ब्रह्मा जगत की चेष्टा को देखकर और जगत की मर्यादा को ठीककर फिर आत्मा में स्थित हो जाते हैं