Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 59, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 59, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
चित्सर्गोपरमाकाशे ब्रह्मणो यन्मनःफलम् ।
उदेति प्रथमः सैव ब्रह्मत्वं समवाश्नुते ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
उन पूर्वोक्त तीन अनीकों में (दलों में) पहला अनीक मानस उपासना का फल होने के कारण एक
मात्र मन से उत्पन्न होनेवाला है, अतएव सूक्ष्म होने से उसकी प्राप्ति में विशेषता कहते हैं।
चूँकि पहला दल चिद्रूप सब सृष्टियों के उपरमस्वरूप ब्रह्माकाश में ब्रह्मा के मन से कल्पित फल के
समान मन का फल होकर पहले उत्पन्न होता है, अत: वही स्वतःसिद्ध ज्ञानरूप ऐश्वर्य से पहले ब्रह्मत्व
को भली भाँति जानकर उसको प्राप्त करता है