Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 60, Verses 1–4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 60, verses 1–4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 1-4
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अस्मिन्भगवति ब्रह्मंश्चपलं पदमाश्रिते ।
पितामहे महाबाहो कृतसर्गव्यवस्थितौ ॥ १ ॥
जगज्जीर्णारघट्टेऽस्मिन्वहति स्वव्यवस्थया ।
विप्रेतभूतघटया रज्वा जीविततृष्णया ॥ २ ॥
ब्रह्मोत्थेषु च भूतेषु विशत्सु भवपञ्जरम् ।
आवर्तेष्वीश्वरव्योमवालमध्यविवर्तिषु ॥ ३ ॥
मनःस्वन्येषु वातान्तलोलाहतकणेष्विव ।
अनारतं विनिर्यान्ति विशन्त्यन्ये तथाभितः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त तीन अनीकसृष्टियों का- “सा व्योमानिलमाश्रित्य' इत्यादि से संक्षेप से कहे गये क्रम के
विस्तार से वर्णन करने के लिए भूमिका बाँधते हैं।
हे महाबाहो श्रीरामचन्द्रजी, सृष्टि की व्यवस्था करनेवाले पितामह भगवान ब्रह्मा के समाधि से
व्युत्थित होने पर, इस जगद्रूपी जीर्णं घटीयन्त्र (रहट) के भरे हुए प्राणी रूपी घड़ों से युक्त रस्सी द्वारा
पुनः पुनः देह ग्रहण से जीव और जल की तृष्णा से आरोह और अवरोह क्रम से चलने पर, ब्रह्मा से
उत्पन्न हुए जीवों के संसाररूपी पिंजड़े में प्रवेश करने पर अन्यान्य मनों के मायाशबल ब्रह्मा के प्रथम
उत्पन्न पुत्रभूत आकाश में वायु के झोंके से चंचल और आहत जलकणों से व्याप्त आवर्तं की भाँति
घूमने पर ब्रह्म में जीवों के समूह निरन्तर उपाधि के उत्पन्न होने के कारण अग्नि के विस्फुलिंग के
समान बाहर निकलते हैं और कोई उपाधि के नष्ट होने से सुषुप्ति की तरह विश्रान्ति के लिए ब्रह्म में
प्रवेश करते हैं
सर्ग सन्दर्भ
उनसठवाँ सर्ग समाप्त साठवाँ सर्ग ब्रह्मा से उत्पन्न हुए जीवों के देह ग्रहण के क्रम का और प्रधानरूप से ज्ञान के भाजन सात्विक जीवों के देह ग्रहण के क्रम का वर्णन |