Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 60, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 60, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अदृष्टान्यशरीरश्रीः क्रमते यो न चोदति ।
स हि सत्येव जातिः स्यादुदारव्यवहारवान् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार गर्भ में प्राप्त हुए जीवों के जन्म में निमित्तमेद होने से विशेषता दशरतिं है ।
पूर्वजन्म में जिसने स्त्री, पुत्र आदि के शरीरों की शोभा नहीं देखी, जो मरने तक सर्वथा विरक्त
होकर रहता है ओर जो राग आदि से ओर बहुत से कर्मकाण्ड आदि शास्त्रों एेहिक ओर पारलौकिक
भोग के साधन लौकिक और वैदिक कर्मो में प्रेरित होता हुआ भी उनमें प्रवृत्त नहीं होता है, वह श्रेष्ठ
पुरुष पूर्वोक्त क्रम से देवगर्भ में उत्पन्न होता हुआ अत्यन्त सात्विक जाति का होकर उस जन्म में ज्ञान
प्राप्त करके उदार जीवन्मुक्तोचित व्यवहारवाला होता है । उसी जन्म से यदि वह मोक्षभागी हो, तो
सात्विक कहा जाता है